UGC के नए नियमों पर बवाल, छात्र कर रहे विश्वविद्यालय में आंदोलन
शुरुआती ड्राफ्ट में OBC जातियों को जाति-आधारित भेदभाव (Discrimination) के दायरे में स्पष्ट रूप से नहीं रखा गया था। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली शिक्षा संबंधी संसदीय समिति ने सिफारिश की कि उच्च शिक्षा में पिछड़ों के साथ होने वाले भेदभाव को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए जितना SC-ST के मामले में। इसी आधार पर फाइनल रेगुलेशंस में OBC को भी शामिल किया गया।
देश/विदेश (जनमत) :- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की ओर जनवरी 2026 में जारी नए 'एंटी-डिस्क्रिमिनेशन' रेगुलेशंस को लेकर देश भर में तीखी बहस छिड़ी हुई है। जहां एक ओर सवर्ण समाज (जनरल कैटेगरी) के कुछ हिस्सों में इन नियमों को लेकर गुस्से का उबाल है, छात्र जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी जमकर इसका तीखा विरोध हो रहा है। वहीं दूसरी ओर कुछ नेताओं द्वारा उच्च शिक्षा में SC, ST और OBC छात्रों की सुरक्षा के लिए इसे बड़ा कदम माना जा रहा है। तथा ऐसे नेता इन नए नियमों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में आजाद समाज पार्टी के प्रमुख नगीना सांसद चन्द्र शेखर आजाद, पूर्व मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्या और निषाद पार्टी के मुखिया तथा सरकार में मत्स्य मंत्री डॉ संजय निषाद ने इन नियमों का समर्थन किया है।
हालिया जानकारी के अनुसार सबसे बड़ी बात यह है कि, इस बवाल के मुख्य जनक और स्थिति उत्पन्नकर्ता मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह हैं। सारा विवादित खेल दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति की सिफारिशों के बाद ही हुआ है।
इन विवादित बदलावों की नींव 8 दिसंबर 2025 को रखी गई थी, जब मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसी समिति के सुझावों पर अमल करते हुए UGC ने hb अपने मूल ड्राफ्ट में कई महत्वपूर्ण संशोधन किए, जिससे बवाल मचा हुआ है।
दिग्विजय सिंह की समिति ने की थी सिफारिश
शुरुआती ड्राफ्ट में OBC जातियों को जाति-आधारित भेदभाव (Discrimination) के दायरे में स्पष्ट रूप से नहीं रखा गया था। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली शिक्षा संबंधी संसदीय समिति ने सिफारिश की कि उच्च शिक्षा में पिछड़ों के साथ होने वाले भेदभाव को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए जितना SC-ST के मामले में। इसी आधार पर फाइनल रेगुलेशंस में OBC को भी शामिल किया गया।
इक्विटी कमेटी में प्रतिनिधित्व का नया फॉर्मूला
संसदीय समिति ने संस्थानों के भीतर बनने वाली 'इक्विटी कमेटी' (Equity Committee) के ढांचे पर भी कड़ा रुख अपनाया। समिति ने सिफारिश की कि इस कमेटी में SC, ST और OBC वर्गों के प्रतिनिधियों की संख्या आधे से अधिक (50% से ज्यादा) होनी चाहिए। इसका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि भेदभाव की शिकायतों का निपटारा निष्पक्ष हो और वंचित वर्गों की बात मजबूती से रखी जा सके। इस कमेटी में जनरल कैटेगरी से किसी सदस्य को नहीं रखने को लेकर विरोध हो रहा है। ऐसे में सवर्ण समाज के लोगों बिना गुनाह किए गुनहगार हो जाने डर सता रहा है। जबकि, बिना पीड़ित हुए ही SC-ST-OBC छात्र पीड़ित दिखने लगे हैं।

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