बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर कथित हमलों पर चिंता, मानवाधिकार और संवैधानिक तरीकों से आवाज़ उठाने की अपील

भारत एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखने और पीड़ितों के समर्थन में आवाज़ उठाने का अधिकार प्राप्त है।

बांग्लादेश में हिंदू समुदाय पर कथित हमलों पर चिंता, मानवाधिकार और संवैधानिक तरीकों से आवाज़ उठाने की अपील
PUBLISHED BY - MANOJ KUMAR

मुजफ्फरनगर से संजय कुमार की रिपोर्ट —

मुजफ्फरनगर/जनमत न्यूज। बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के विरुद्ध कथित रूप से हो रहे हमलों, हत्याओं, घरों को जलाए जाने और महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएँ अत्यंत गंभीर, चिंताजनक और मानवता को शर्मसार करने वाली बताई जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के माध्यम से सामने आ रही इन घटनाओं ने विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है, जिन पर वैश्विक स्तर पर गंभीरता से संज्ञान लिया जाना आवश्यक है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन कथित घटनाओं के विरुद्ध कुछ वर्गों की ओर से अपेक्षित संवेदनशील और स्पष्ट प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिल रही है। किसी भी निर्दोष नागरिक पर अत्याचार—चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या देश से संबंधित हो—न केवल निंदनीय है, बल्कि मानवाधिकारों के मूल सिद्धांतों के भी विरुद्ध है। ऐसे मामलों में चुप्पी या उदासीनता भी चिंता का विषय बन जाती है।

भारत एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को कानून के दायरे में रहकर अपनी बात रखने और पीड़ितों के समर्थन में आवाज़ उठाने का अधिकार प्राप्त है। इसी संदर्भ में भारत के हिंदू समाज से यह आग्रह किया गया है कि वे बांग्लादेश में पीड़ित हिंदुओं के समर्थन में शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीकों से अपनी आवाज़ बुलंद करें तथा सरकार और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस विषय को उठाने की मांग करें।

साथ ही भारत सरकार से भी अपील की गई है कि वह कूटनीतिक स्तर पर बांग्लादेश सरकार से वार्ता कर वहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित कराने के लिए ठोस कदम उठाए। इसके अतिरिक्त शरणार्थियों और सीमा सुरक्षा से जुड़े मामलों में अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवीय दृष्टिकोण के तहत आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी प्रकार की नफरत, हिंसा या कानून से परे जाकर की गई कार्रवाई न तो देश के हित में है और न ही समाज के। ऐसे संवेदनशील विषयों का समाधान संवाद, न्याय, मानवाधिकारों के सम्मान और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है।