बांदा से आशीष सागर दीक्षित की रिपोर्ट —
बांदा/जनमत न्यूज। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, वैसे-वैसे कुछ मुद्दे अचानक तेज हो जाते हैं। इन्हीं मुद्दों में से एक बुंदेलखंड को पृथक राज्य बनाने की मांग भी है। चुनावी मौसम में इस मांग को लेकर बैठकें, पदयात्राएं, जुलूस और ज्ञापन देने की गतिविधियां तेज हो जाती हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यह मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक परिदृश्य से ओझल होता नजर आता है। यही कारण है कि अब आम जनता के बीच यह सवाल गंभीरता से उठने लगा है कि क्या बुंदेलखंड राज्य की मांग केवल चुनावी “लॉलीपॉप” बनकर रह गई है या वास्तव में इसके पीछे कोई ठोस संकल्प भी है।
बुंदेलखंड क्षेत्र लंबे समय से आर्थिक, सामाजिक और प्राकृतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। यहां जल संकट, अनियंत्रित खनन, जंगलों का क्षरण, कृषि की अनिश्चितता, बेरोजगारी और पलायन जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। नदियों और पहाड़ों का बेतरतीब उत्खनन, खेतिहर जमीनों पर स्थापित स्टोन क्रेशर, सूखते जलस्रोत और पारंपरिक जल संरचनाओं की उपेक्षा ने क्षेत्र की स्थिति को और जटिल बना दिया है। इसके साथ ही कई बड़े बांध परियोजनाओं और विकास योजनाओं के कारण आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के विस्थापन का मुद्दा भी गंभीर बना हुआ है।
पन्ना और छतरपुर के जंगलों में रहने वाले आदिवासी समुदायों का विस्थापन, पन्ना टाइगर रिजर्व से जुड़े आंदोलन, बक्सवाहा जंगल को बचाने की आवाज तथा किसानों की आत्महत्याओं जैसे मुद्दे भी बुंदेलखंड की जमीनी हकीकत को उजागर करते हैं। विडंबना यह है कि इन मूलभूत समस्याओं पर न तो अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग उठाने वाले नेतृत्व की ओर से व्यापक चर्चा होती है और न ही क्षेत्र का बौद्धिक समाज इस पर पर्याप्त दबाव बनाता दिखाई देता है।
पिछले दो दशकों में बुंदेलखंड विकास बोर्ड के गठन के बावजूद क्षेत्रीय विकास की अपेक्षाएं पूरी तरह साकार नहीं हो सकीं। छोटे शहरों का अनियोजित विस्तार, खराब जल निकासी व्यवस्था और सूखा या अकाल जैसी स्थितियां यहां के लोगों के लिए आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं। पारंपरिक तालाबों और प्राचीन जलस्रोतों की उपेक्षा ने कृषि व्यवस्था को कमजोर किया है, जिससे खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है और युवाओं का पलायन लगातार बढ़ रहा है।
इसी पृष्ठभूमि में पृथक बुंदेलखंड राज्य की मांग को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। इस मांग के समर्थकों का तर्क है कि यदि अलग प्रशासनिक ढांचा बनेगा तो क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाएं बन सकेंगी और विकास की गति तेज होगी। हालांकि इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू राजनीतिक इच्छाशक्ति का है।
वर्तमान समय में स्थिति यह है कि पिछले एक दशक में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों में एक ही दल की सरकारें रही हैं और केंद्र में भी वही दल सत्ता में रहा है। यदि वास्तव में बुंदेलखंड राज्य के गठन को लेकर गंभीर पहल होती, तो यह समय सबसे अनुकूल माना जा सकता था। लेकिन इसके बावजूद संसद या विधानसभाओं में इस दिशा में कोई ठोस पहल सामने नहीं आई है।
हाल के दिनों में बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा बांदा के ग्रामीण क्षेत्रों में पदयात्रा निकाली जा रही है। वहीं झांसी में पूर्व राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने समर्थकों के साथ अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग को लेकर मार्च निकाला। इसके अलावा अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता राजा बुंदेला भी गांव-गांव पदयात्रा के माध्यम से इस मुद्दे को उठाने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि किसी भी नए राज्य के गठन के लिए भारतीय संविधान के तहत स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित है, जिसके अनुसार संसद में विधेयक लाना होता है और संबंधित राज्यों की विधानसभाओं से राय ली जाती है। लेकिन इस दिशा में अब तक कोई ठोस राजनीतिक प्रक्रिया शुरू होती दिखाई नहीं देती।
बुंदेलखंड क्षेत्र से चुने गए अधिकांश सांसद और विधायक भी इस मुद्दे पर सामूहिक रूप से मुखर नजर नहीं आते। कभी-कभार कुछ जनप्रतिनिधि इस विषय को उठाते जरूर हैं, लेकिन व्यापक और संगठित राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिशें कम ही दिखाई देती हैं। यही कारण है कि जनता के मन में इस मांग को लेकर संदेह की स्थिति बनी रहती है।
एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बुंदेलखंड का एक बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश में भी आता है। बिना मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड जिलों को शामिल किए अलग राज्य का गठन संभव नहीं है, लेकिन वहां इस मांग को लेकर अपेक्षित जनआंदोलन या राजनीतिक सक्रियता दिखाई नहीं देती। इससे यह धारणा भी मजबूत होती है कि उत्तर प्रदेश के हिस्से में यह मुद्दा कहीं न कहीं चुनावी रणनीति का हिस्सा बनकर रह गया है।
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि बुंदेलखंड की समस्याएं वास्तविक और गंभीर हैं। क्षेत्र के विकास के लिए बेहतर सिंचाई व्यवस्था, विंध्य क्षेत्र की नदियों के जल का समुचित उपयोग, स्थानीय उद्योगों का विकास, रोजगार के अवसर, भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की ठोस नीतियों की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन मूलभूत समस्याओं के समाधान की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाते हैं, तो पृथक राज्य की मांग का स्वरूप भी बदल सकता है। फिलहाल सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि बुंदेलखंड के सभी जनप्रतिनिधि, चाहे वे किसी भी दल से हों, इस मुद्दे पर स्पष्ट और सामूहिक रुख अपनाएं।
केवल पदयात्राओं, आंदोलनों और नारों से अलग बुंदेलखंड राज्य का सपना साकार नहीं होगा। इसके लिए विधानसभाओं और संसद में ठोस राजनीतिक पहल और व्यापक जनसमर्थन जरूरी है। अन्यथा यह मुद्दा हर चुनाव में उठेगा, कुछ समय तक सुर्खियां बटोरेगा और फिर राजनीतिक शोर में कहीं गुम हो जाएगा।
ऐसी स्थिति में बुंदेलखंड की जनता के मन में यह सवाल लगातार बना रहेगा—क्या पृथक बुंदेलखंड राज्य वास्तव में विकास का रास्ता है या फिर यह केवल चुनावी मौसम में गूंजने वाला एक परिचित नारा बनकर रह गया है।