सड़क नहीं, हादसों का रास्ता बना गुलरिहा, विकास की फाइलों में दबा इंसाफ का सवाल
गुलरिहा की तथाकथित सड़क अब सड़क नहीं, बल्कि कीचड़, गड्ढों और दलदल का खतरनाक जाल बन चुकी है। इस रास्ते से रोज़ बच्चे स्कूल जाते हैं, महिलाएं बाजार जाती हैं और बुजुर्ग अपनी जान जोखिम में डालकर आवागमन करने को मजबूर हैं।
बलरामपुर से गुलाम नबी की रिपोर्ट —
तुलसीपुर/बलरामपुर/जनमत न्यूज। यह कहानी किसी दूरस्थ या दुर्गम इलाके की नहीं, बल्कि विकास खंड तुलसीपुर की उस जमीनी हकीकत की है, जहां विकास आज भी कागज़ों और भाषणों तक सीमित नजर आता है। ग्राम पंचायत महेईया का मजरा गुलरिहा आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित होकर उसी दौर में जी रहा है, जहां सड़क का नामो-निशान तक नहीं है, लेकिन हादसे रोज़मर्रा की बात बन चुके हैं।
गुलरिहा की तथाकथित सड़क अब सड़क नहीं, बल्कि कीचड़, गड्ढों और दलदल का खतरनाक जाल बन चुकी है। इस रास्ते से रोज़ बच्चे स्कूल जाते हैं, महिलाएं बाजार जाती हैं और बुजुर्ग अपनी जान जोखिम में डालकर आवागमन करने को मजबूर हैं। बारिश के दिनों में फिसलन इतनी भयावह हो जाती है कि गिरना लगभग तय रहता है। सवाल सिर्फ इतना रह जाता है कि चोट कितनी गंभीर होगी।
ग्रामीणों के अनुसार आए दिन बाइक सवार फिसलकर गिर रहे हैं, लोग लहूलुहान हो रहे हैं और हर हादसे के बाद एक ही सवाल गूंजता है—इलाज का खर्च कौन उठाएगा और अगर किसी की जान चली गई तो जिम्मेदार कौन होगा। ग्रामीणों का आरोप है कि गांव के विकास को वोटों से तौला गया है। जहां अधिक वोट मिले, वहां सड़क, नाली और रोशनी है, जबकि जहां वोट कम पड़े, वहां गुलरिहा जैसे मजरे को अंधेरे और दलदल में छोड़ दिया गया।
यह मजरा आठ गांवों में शामिल होने के बावजूद सबसे अधिक बदहाली का शिकार है। हालात ऐसे हैं कि बच्चे समय पर स्कूल नहीं पहुंच पा रहे, महिलाएं रोज़ चोटिल हो रही हैं और बुजुर्ग घर से निकलने में डर महसूस कर रहे हैं। इसके बावजूद प्रशासन की चुप्पी और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ग्रामीणों के आक्रोश को और बढ़ा रही है।
समस्या सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है। गांव में कई कुएं खुले पड़े हैं, जिन पर ढक्कन नहीं हैं। कई हैंडपंप खराब या खंडहर में तब्दील हो चुके हैं। पीने के पानी, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का कोई ठोस इंतजाम नहीं है। सब कुछ मानो भगवान भरोसे छोड़ दिया गया हो।
जब इस संबंध में ग्राम प्रधान से सवाल किया गया तो वही पुराना जवाब मिला कि प्रस्ताव भेज दिया गया है। लेकिन ग्रामीणों का सवाल है कि जब हादसे हो रहे थे, तब प्रस्ताव क्यों नहीं भेजा गया। क्या अब सड़कें केवल चुनाव के समय ही याद आती हैं। जैसे-जैसे प्रधानी चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वादों की बारिश शुरू हो गई है, लेकिन गुलरिहा के लोग साफ कह रहे हैं कि अब उन्हें सिर्फ वादे नहीं, बदलाव चाहिए।
ग्रामीणों का कहना है कि अब वे केवल सड़क नहीं मांग रहे, बल्कि इंसाफ की मांग कर रहे हैं। उनका सवाल सीधा है—क्या उन्हें भी इंसान समझा जाएगा या यूं ही दलदल में धकेलकर उनकी आवाज़ को अनसुना किया जाता रहेगा।

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