सनातन संस्कृति संपर्क यात्रा का संभल में भव्य समापन, अमेरिका से आए संतों का हुआ जोरदार स्वागत
सनातन संस्कृति संपर्क यात्रा का शुभारंभ प्रयागराज से किया गया था। इस यात्रा के माध्यम से सनातन संस्कारों, भारतीय संस्कृति और परंपराओं के महत्व को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया।
संभल से रामब्रेस यादव की रिपोर्ट —
संभल/जनमत न्यूज। भारतीय सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार और जन-जागरण के उद्देश्य से आयोजित सनातन संस्कृति संपर्क यात्रा का मंगलवार को संभल जनपद में भव्य समापन हुआ। इस अवसर पर अमेरिका से पधारे श्रद्धेय स्वामी अनिल जी एवं आदरणीय माता मधु जी का संभल में जोरदार स्वागत किया गया। यात्रा के समापन पर श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला।
जानकारी के अनुसार सनातन संस्कृति संपर्क यात्रा का शुभारंभ प्रयागराज से किया गया था। इस यात्रा के माध्यम से सनातन संस्कारों, भारतीय संस्कृति और परंपराओं के महत्व को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया। यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के 74 जिलों में सनातन संस्कृति का संदेश दिया गया और मंगलवार को 75वें जिले संभल में इसका विधिवत समापन हुआ।
श्रद्धेय स्वामी अनिल जी ने अपने संबोधन में कहा कि देवभूमि उत्तर प्रदेश, जो भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि रही है, वहां सनातन संस्कृति के प्रति फैलाई जा रही नकारात्मक सोच को समाप्त कर भारतीय संस्कृति और संस्कारों के पुनर्जागरण का यह प्रयास है। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा विश्व को शांति, सद्भाव और नैतिक मूल्यों का संदेश देती है।
यात्रा के अंतिम चरण में संभल जनपद के ऐचौड़ा कंबोह थाना क्षेत्र स्थित कल्कि धाम में विशेष यज्ञ का आयोजन किया गया। मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु के होने वाले दसवें अवतार कल्कि अवतार की भूमि माने जाने वाले संभल में इस अंतिम यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसे यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव माना गया।
माता मधु जी ने कहा कि सनातन संस्कृति केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। इस यात्रा का उद्देश्य युवाओं और समाज के हर वर्ग को अपनी जड़ों से जोड़ना और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को समझाना है।
समापन कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, संत-महात्मा और स्थानीय लोग मौजूद रहे। यज्ञ और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ सनातन संस्कृति संपर्क यात्रा का विधिवत समापन किया गया। आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय आयोजकों और सनातन प्रेमियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

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