विश्व जल दिवस पर विशेष: आजादी के 77 साल में यूपी से करीब 77 हजार तालाब और कुएं गायब
आज विश्व जल दिवस है। ताजे पानी की शुद्धता को लेकर वैश्विक स्तर (यूनाइटेड नेशंस) पर 1993 से विश्व जल दिवस हर साल 22 मार्च को मनाया जाता है।
बांदा से आशीष सागर दीक्षित की रिपोर्ट
बांदा/जनमत न्यूज़। आज विश्व जल दिवस है। ताजे पानी की शुद्धता को लेकर वैश्विक स्तर (यूनाइटेड नेशंस) पर 1993 से विश्व जल दिवस हर साल 22 मार्च को मनाया जाता है। जिसमें भूगर्भीय जल स्रोतों एवं नैसर्गिक जल राशियों के संरक्षण और उनकी शुद्धता को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाते है।
आजादी के 77 वें वर्ष में प्रवेश कर चुके भारत के लोकतांत्रिक राज्य उत्तरप्रदेश से समाज ने स्वराज्य की अवधारणा में तालाबों को खोने का कीर्तिमान बनाया है। यूपी में गांव, गांव अधाधुंध विकास और शहरी अनियोजित मॉडल ने ताबड़तोड़ तरीके से 77 हजार तालाब दफन कर दिए है।
बुंदेलखंड में ही 5 हजार तालाब जमीन से नदारद हुए है। यूपी और एमपी बुंदेलखंड के तेरह जिलों में चंदेल कालीन तालाबों की जल संरचना और ग्राम सभाओं में निर्मित इन छोटे, बड़े तालाबों की संख्या 31 हजार से ज्यादा थी।
बुंदेलखंड के चित्रकूट मंडल मुख्यालय बांदा को साल 2024 का राष्ट्रीय जल संरक्षण पुरस्कार केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से मिल चुका है। जिसमें भी स्थानीय अफसरों खासकर तत्कालीन सीडीओ वेद प्रकाश मौर्या एवं जिलाधिकारी थी दुर्गा शक्ति नागपाल का भ्रष्टाचार सूचना अधिकार से उजागर हो चुका है।
साल 20 मार्च 2015 तक खत्म हुए तालाबों का आंकड़ा
उप्र में 20 मार्च साल 2015 तक 68 हजार से ज्यादा तालाब, पोखर, झीलों और कुओं का अवसान हुआ है। यह त्रासदी गंगा के मैदान में बसे उत्तरप्रदेश की विडम्बना है। सूबे में उत्तम प्रदेश की छवि के दरम्यान अधाधुंध शहरीकरण जीवन का पर्याय बन चुका है किन्तु उसके जल स्रोत और प्राकृतिक जल राशियों मसलन बड़े, छोटे तालाबों का तेजी से विलुप्तीकरण हो रहा है।
इन तालाबों की छाती और शहरी भू माफिया और ग्राम सभाओं में अवैध कब्जेधारक काबिज हो चुके है। गांव से शहर तक तालाबों को पाटकर पक्के कंक्रीट के आलिशान मकान खड़े हो रहें है।
हालात तो यह है कि तालाबों को बचाने का आदेश पारित करने वाले उच्च न्यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ का भवन भी तालाब के हिस्से पर बना है।
शहरी और ग्रामीण विकास की बदनीयती से उन अवैध कब्जों पर जमीनी कार्यवाही तक शिथिल और लचर सरकारी तंत्र का कोप झेल रही है । यह लापरवाही ही तालाबों को खत्म करने वाली नकारा अफसरों की ब्यूरोक्रेसी का लिजलिजा हिस्सा है।
काबिलेगौर है कि वर्ष 1947 मे उत्तरप्रदेश के राजस्व अभिलेखों में तालाबों, पोखरों, झीलों, कुओं की शक्ल मे प्राकृतिक जल स्रोतों के 8,91,214 आंकड़े दर्ज थे। समय के साथ द्रुत गति से चलता विकास तालाबों के अस्तित्व को मिटाने का कुचक्र रच रहा है।
राजस्व परिषद की रिपोर्ट बतलाती है कि फरवरी 2015 मे अभिलेखों में प्राकृतिक जल स्रोतों की दर्ज संख्या 8,22,899 रह गई थी। वहीं गुजरे 77 वर्षों मे करीब 77 हजार मोटे तौर पर और रिकॉर्ड में 68,315 जल स्रोत कम हुए है।
इन सरकारी आंकड़ों को औसत के नियम में परखें तो हर साल प्रदेश में एक हजार जल स्रोत खत्म हो रहें है। इनका वजूद मिटा है या अत्यंत सिकुड़ गया है। उल्लेखनीय है इन 77 साल में राजस्व अभिलेख में दर्ज इन जल भंडारों का क्षेत्रफल 1500 एकड़ कम हुआ है।
जो आजादी के 68 साल में 829.99 एकड़ कमतर था। जबकि स्वतंत्रता के समय इन भंडारों का कुल क्षेत्रफल 546216.9 एकड़ था। जो आजादी के 68 साल में घटकर 547046.9 एकड़ रह गया था। यह आज 77 वें साल में और अधिक घट गया है।
इन प्राकृतिक जल स्रोत पर यूपी में भू माफिया की पैनी गिद्ध नजर लगी रहती है। इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विगत वर्ष 2015 तक कुल1,10,950 तालाबों, पोखरों, झीलों और कुओं में अवैध कब्जे पाए गए थे। जिनका कुल क्षेत्रफल 18,491 एकड़ था।
वहीं सरकारी अभियान से इनमें से 67,028 जल स्रोतों को अतिक्रमण से मुक्त करने का दावा किया गया। जबकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक ही साल 2015 तक 43,922 जल भंडार तब भी अवैध कब्जों का शिकार थे।
बुंदेलखंड में मौजूद थे 31 हजार से ज्यादा बड़े, छोटे तालाब
यूपी, मध्यप्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में कुल 13 जिले मौजूदा वक्त में शामिल है। यह महाराजा छत्रसाल के विंध्याचल बुंदेलखंड में लगभग 21 जिले तक विस्तृत थे। इस हरेभरे विंध्याचल बुंदेलखंड में चंदेल कालीन और ग्राम समाज के जमीनों पर निर्मित छोटे, बड़े तालाबों की संख्या अनुमानित 31 हजार के आसपास या कम ज्यादा थी।
जिसमें मध्यप्रदेश का टीकमगढ़, छतरपुर, सागर, पन्ना जिला चंदेलों की जल संरचना का महत्वपूर्ण उदाहरण था। कमोबेश यही स्थिति यूपी बुंदेलखंड के महोबा जो चंदेल कालीन बड़े तालाबों का गर्भगृह था।
इस जिले की तहसील और राजशाही रियासत चरखारी को मिनी कश्मीर कहते थे क्योंकि यहां बड़े तालाबों का विशाल जल भंडार स्थापित रहा है। वहीं इसी जिले के बेला ताल, सदर महोबा मे कीरत सागर,मदन सागर, जय सागर, विजय सागर जैसे अदभुत तालाब होते थे। वहीं झांसी जिले का लक्ष्मी तालाब आज आवासीय आबादी में गुम हो चुका है।
वहीं चित्रकूट में भी कोठी तालाब, गणेश बाग तालाब जर्जर स्थिति में है। चित्रकूट मंडल के बांदा मे नरैनी तहसील अंतर्गत कालिंजर दुर्ग में बने बड़े तालाब चंदेलों की जल संरक्षण विद्या का प्रत्यक्ष प्रमाण थे। ग्रामीण और शहरी भूभाग में बांदा के अंदर ही 5 हजार से ज्यादा तालाब थे।
जिले की अतर्रा तहसील के ज्यादातर तालाब नष्ट हो रहें है। एक तालाब की जमीन पर नगर पालिका आरटीआई जवाब की मानें तो जल संस्थान का कार्यालय बन चुका है। बांदा शहर में 12 बड़े तालाब बने थे।
जिनमें प्रागी तालाब, कंधरदास तालाब, छाबी तालाब,बाबू साहब तालाब, नवाब टैंक, साहब तालाब, डिग्गी तालाब, लाल डिग्गी तालाब, कच्चा तालाब, भरभुजिन तलैया, बाबा तालाब, ग्राम मवइ का गोसाई तालाब आदि प्रमुख थे। इनकी दुर्दशा भी आज देखते बनती है।
बुंदेलखंड के यूपी राजस्व भू अभिलेख दस्तावेज में अंकित वर्तमान 5 हजार से ज्यादा तालाबों में 2902 तालाब तो पूरी तरह नदारद हो चुके है। इसकी जानकारी सूचना अधिकार कानून से कुछ वर्ष पूर्व मिली थी।
वहीं जिला बांदा एवं अर्थ संख्या विभाग और भू राजस्व विभाग का साल 2006 मे हुआ सर्वेक्षण बतलाता है कि बांदा में ही 5805 तालाब जल स्रोत उपलब्ध थे। जिसमें 3602 तालाब भू माफिया द्वारा कब्जा कर लिए गए। अथवा जोत लिए गए है।
उत्तरप्रदेश सरकार की गत वर्ष तक चल रही "अमृत सरोवर तालाब योजना" के स्थलीय सर्वेक्षण में ही सूचीबद्ध कुल तालाबों में से 602 तालाब खोजने पर अफसरों को नहीं मिले थे।
बुंदेलखंड में तालाबों का महत्व कितना समसामयिक था इसकी प्रासंगिकता इस बात से मिलती है कि उच्च न्यायालय इलाहाबाद की एकल पीठ ने अगस्त साल 2025 में जस्टिस जेजे मुनीर की बेंच से बुंदेलखंड में गायब हुए 42050 तालाबों की खबरों का स्वतः संज्ञान लेकर एक जनहित याचिका में यूपी के बुंदेलखंड वाले सात जिलों के डीएम से व्यक्तिगत हलफनामा मांग कर जवाब तलब किया था।
जिसकी सुनवाई 17 सितंबर 2025 को हुई थी जिसमें इस याचिका को एक अन्य तालाबों वाली याचिका के साथ मर्ज किया गया था।
बांदा के अमृत सरोवर तालाब योजना में व्यापक स्तर पर वित्तीय गबन हुआ है। हर ग्राम पंचायत में मनरेगा योजना से बने पुराने तालाबों पर इस योजना से नया बजट लाकर सुंदरीकरण,पक्के घाट और गहरीकरण किया गया था।
आरटीआई से मिले 405 अमृत सरोवर तालाब की कारगुज़ारी बेहद संजीदा है। लेकिन अमृत सरोवर योजना का सरकारी उद्देश्य महज भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया और आज यह सभी तालाबों का सूरतेहाल बांदा सहित अन्य जिलों में बेपानीदार ही है।
लेकिन पूरी सरकारी व्यवस्था जल संरक्षण सम्मान लेकर बेशर्मी से चुपचाप बैठी है। बुंदेलखंड में मनरेगा योजना से ही पूर्व में साल 2013 तक आदर्श तालाब योजना चली थी जिसमें 19 करोड़ रुपए पानी की तरह चित्रकूट मंडल में ही बहा दिए गए थे। आज इनको धरातल पर ढूंढ नहीं पाएंगे।
बांदा मे विकासखंड वार मौजूद तालाब
बांदा जिले में अर्थ एवं संख्या विभाग के सर्वेक्षण साल 2006 अनुसार विकासखंड वार कुल तालाबों की संख्या इस प्रकार थी।
महुआ में 508 तालाब, नरैनी में 942 तालाब, बड़ोखर में 922 तालाब, कमासिन में 436 तालाब, बिसंडा में 555 तालाब, बबेरू में 860 तालाब, जसपुरा में 349 तालाब, तिंदवारी में 601 तालाब अर्थात कुल 5805 तालाब बांदा मे थे।
जिसमें शहर के प्रमुख तालाब की संख्या अलग से समाहित है। इन तालाबों की सुंदरता पर अब तक लाखों रुपया भूमि संरक्षण/ कृषि विभाग ने विभिन्न मद से खर्च किया है।
बांदा का छाबी तालाब कामधेनु और कब्जों का भूखंड
बांदा शहर मे ही तालाबों को किस तर्ज पर भूमाफिया और शहरीकरण ने चपेट में लिया है। इसकी नजीर शहर का छाबी तालाब है। बामदेव ऋषि की तपोस्थली के समीप बना यह तालाब कभी 22 एकड़ का हुआ करता था। आज बमुश्किल कुछ बीघा में सिमट गया है।
इस तालाब के दक्षिणी हिस्से के घाट बांदा शहर के मशहूर चोर आबिद बेग ने बनवाए थे। अत्यंत सुंदर छवि के कारण इसका नाम छवि तालाब था। यह बाद में शाब्दिक अपभ्रंश से छाबी तालाब हो चुका है। इस तालाब को हर सरकार मे विकास का सब्जबाग दिखाया गया।
उदाहरण के लिए शहर के छाबी तालाब पर ही अकेले यूपी सरकार ने अमृत सरोवर योजना से साल 2024 मे कार्यदाई संस्था सीएनडीएस के माध्यम से 3 करोड़ रुपया खर्च करने के बाद विकास कार्य रोक दिया।
तालाब के प्रवेश द्वारा पर लगा योजना का सूचना बोर्ड देखने काबिल है। बावजूद इसके इस तालाब की सूरत नहीं बदल सकी है। आज तालाब में मिट्टी खुदी पड़ी है। वहीं तालाब दो हिस्सों में बंट गया है।
तालाब से लगे पुराने मंदिर और घाट नए विकास कार्य ने दफन कर दिए है। शहर का बदबूदार नाला आज भी तालाब के अंदर से होकर सीधा अविरल जल स्रोत केन नदी मे गिरता है। इस तालाब के एक हिस्से में सरकारी अन्नपूर्णा भवन एवं पुराना पंचायत भवन भी निर्मित है।
तालाब के ही हिस्से की जमीन पर भारी अवैध कब्जे विकास को चरितार्थ करते है। पुरानी ककैया ईंट की दीवार के अवशेष इस प्राचीन तालाब का रुदन आज भी करते रहते है। अमृत सरोवर योजना से पूर्व भी इसी छाबी तालाब पर साल 2004 मे 6 लाख रुपए खर्च हुए थे।
वहीं 1994 मे शासन ने इसके सुंदरीकरण को 19 लाख रुपया दिया था। बीजेपी की तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष विनोद जैन के कार्यकाल में भी इस तालाब की मिट्टी निकालकर ठेकेदार ने बेच ली थी और सुंदरीकरण में वित्तीय अनियमितता की गई थी।
ऐसे दर्जनों उदाहरण अन्य तालाबों के मामलों पर है जो प्रशासन के लिए बजट हजम करने का जरिया बनकर रह गए है। समाजवादी सरकार मे पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ही 205 करोड़ रुपए बुंदेलखंड के कुछ तालाबों के उद्धार को दिया था। यह तालाब उनमें से एक था।

Janmat News 
