अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष: बुंदेलखंड के बांदा की ऊषा निषाद, जिन्होंने खनन माफियों से सीधा लिया मोर्चा
विंध्याचल हिन्दी पट्टी के जिला बांदा तहसील पैलानी की ग्राम पंचायत सांडी मजरा अमान डेरा की रहने वाली है महिला किसान ऊषा निषाद। बचपन से सरकारी प्राइमरी अध्यापक पिता का साया सिर से उठा तो निरक्षर मां ने परवरिश की है।
बांदा से आशीष सागर दीक्षित की रिपोर्ट
बांदा/जनमत न्यूज़। "आज 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। समस्त महिला, स्त्री शक्ति को हार्दिक शुभमंगल। आज हम यूपी बुंदेलखंड के जिला बांदा की खेतिहर महिला किसान एवं सामाजिक कार्यकर्ता ऊषा निषाद की संघर्ष यात्रा का कुछ अंश लिख रहें है। जिन्होंने गांव की नदी, किसानों की खेती बचाने के लिए लगातार लाल मौरम के खनन ठेकेदारों एवं उनकी आड मे पनपे खनन माफियाओं से सीधा मोर्चा लिया है।"
विंध्याचल हिन्दी पट्टी के जिला बांदा तहसील पैलानी की ग्राम पंचायत सांडी मजरा अमान डेरा की रहने वाली है महिला किसान ऊषा निषाद। बचपन से सरकारी प्राइमरी अध्यापक पिता का साया सिर से उठा तो निरक्षर मां ने परवरिश की है। ऊषा की अन्य चार बड़ी बहन गृहस्थ जीवन मे है जबकि दो बड़े भाई सूरत मे रहकर श्रमजीवी आजीविका चलाते है।
पिता के स्नेह से बाल्यकाल मे ही महरूम महिला किसान यूं तो महज कक्षा 9 तक ही पढ़ी है किंतु अपने परिवार और ग्रामपंचायत सहित आसपास क्षेत्र के जुझारू मुद्दों पर प्रखर आवाज बनकर रसूखदार लोगों से भी भिड़ने का माद्दा रखने वाली ऊषा निषाद बेहद आंशिक भौतिक संसाधनों मे जीवन बसर करती है।
आधुनिक महिलाओं की चकाचौंध से बिल्कुल दूर खड़ी यह महिला किसान साधारण लिबास,सादगी पूर्ण चेहरे लेकिन अपने बेबाक,बेलौस अंदाज के लिए इलाके मे चिरपरिचित लड़की है। यहां लड़की शब्द इसलिए क्योंकि उन्होंने ब्याह नहीं किया है।
जीवन के तमाम उतार चढ़ाव मे सामंती पुरुषों के बर्ताव, सियासतदानों की अवसरवादिता और गांवदारी व परिवार की स्वार्थ पारायणता के दरम्यान बुलंदी से खड़ी रहने वाली ऊषा निषाद साल 2012 से बुंदेलखंड के बांदा मे केन नदी के सफेदपोश रक्तबीजों से लड़ रहीं है। गाहेबगाहे सरकारी व्यवस्था मे पनपे प्रशासनिक पदों पर आसीन भूमाफिया (लोकपाल) और निरंकुश अधिकारी भी ऊषा निषाद की संघर्ष यात्रा मे स्पीड ब्रेकर बनकर खड़े हुए है।
केन नदी के किनारे बसा गांव सांडी
महिला किसान ऊषा निषाद जिस पैतृक गांव से ताल्लुक रखतीं है वह बुंदेलखंड की पानीदार रीढ़ केन नदी के किनारे बसता है। यहां की अधिकांश आबादी मल्लाह (निषाद) ही है।
दो दशक पूर्व तक इस समुदाय का मुख्य पेशा केन नदी पर आश्रित मौसमी खेती, मछली आखेट करके आजीविका चलाना और गांव मे रोजगार न होने की परिस्थितियों मे परदेस जाकर रोज़गार करना रहा है। आज भी इस गांव के ज्यादातर युवा देश के महानगरों मे स्थाई या अस्थाई पलायन करके रोजीरोटी चला रहें है।
गांव के छोटे, मध्यम वर्गीय किसानों की खेतिहर भूमि आज बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। बांदा जिले की पैलानी तहसील के इस ग्रामपंचायत सांडी सहित अलोना, खरेई हार, क्षेत्र के सभी मजरों और पैलानी, जसपुरा के नदी किनारे बसे गांव लाल मौरम खनन माफियाओं से हलाकान है।
इसके लिए प्रतिरोध की उठती आवाजों को सरकारी सिस्टम के नक्कारखाने मे जुल्म करके दबाया जाता है। हालात ये है कि अब मुख्यधारा का मीडिया भी इस भयावह पर्यावरणीय मुद्दों पर किसानों का कमतर साथ देती है।
बावजूद इसके खामोशी के माहौल मे निडरता की नजीर बनकर अकेली महिला पूरे जिले या यूं कहिए यूपी बुंदेलखंड मे बेख़ौफ़, दबंग, कद्दावर मौरम माफियाओं के खिलाफ धूसर गांव से एनजीटी और उच्च न्यायालय तक जीवटता से न्यायिक संघर्ष कर रही है।
साल 2012 में बांदा अशोक लाट तिराहे से अनशन, आंदोलन की पहचान बनी महिला किसान ऊषा निषाद ने जिले के लगभग हर रसूखदार खनन ठेकेदार, सफेदपोश के लिए साफगोई से मुद्दा उठाया है।
निषाद समाज के संसाधन वंचित इस समुदाय के यूं तो कुछ सजातीय नेताओं ने समाजवादी और राष्ट्रवादी राजनीति से अपनी सात पीढ़ियों के लिए धन दौलत, जमीनों, संस्थाओं की खेप तैयार कर ली है। वहीं उनके समुदाय के हासिए पर झुझते किसानों और उनकी ग्रहणी महिलाओं के लिए विकास की बुनियादी विकास धारा भी कच्ची शराब की भट्ठियों और केन के बेलगाम खनन पर दम तोड़ देती है।
काबिलेगौर है कि समाजवादी पार्टी के क्षेत्रीय मजबूत निषाद नेता विशंभर निषाद (पूर्व लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद,मंत्री, विधायक) एवं मौजूदा राज्य सरकार के जलशक्ति राज्य मंत्री रामकेश निषाद भी इसी समाज से संबंध रखते हैं किन्तु समुदाय और उनके रसूख मे अर्श और फर्श का फासला है। यह अलग बात है कि निषाद वोटबैंक हमेशा जातीय भावनात्मक खेल का मोहरा बनकर रह जाता है।
ऊषा निषाद को रोकने के लिए मुस्तैद ब्यूरोक्रेसी
अपने डार्क जोन जल संकट वाले इलाके मे केन नदी के रक्तबीजों और शहरी सरकारी भूमाफिया (लोकसेवक) पर मर्दानी बनकर टूटने वाली ऊषा निषाद को हर बार साजिश और षड्यंत्र से रोकने का प्रयास जारी रहता है।
महिला किसान एवं पर्यावरण कार्यकर्ता को अब तक आधा दर्जन झूठे मुकदमों मे फंसाकर चरित्र मर्दन करने का जतन किया गया है। यूपी की समाजवादी सरकार से भाजपा 2.0 सरकार तक ऊषा निषाद पर फर्जी मुकदमों की फेहरिस्त तैयार की गई।
वहीं कुछ बार उन्हें एसडीएम पैलानी ने शांति भंग के चलान पर प्रतिबंधित करने का काम भी किया है। फिर भी हर बार पहले से ज्यादा मारक बनकर ऊषा निषाद ने जन सरोकार की लड़ाई लड़ी है। विडम्बना है कि अन्य पार्टियों की महिला शक्ति इस यातना और स्त्री जेंडर पर सरकारी शोषण को देखकर निज स्वार्थ मे चुपचाप रहती है।
सपा के पूर्व मंत्री, सांसद से भाजपा के पूर्व विधायक तक और बसपा के पूर्व क्षेत्रीय नेता के दुराग्रहपूर्ण मुकदमेबाजी से आज ग्राम सांडी मे मौरम खण्ड 77 के संचालक न्यू यूरेका माइंस एंड मिनरल्स ऑनर हिमांशु मीणा (मप्र का मल्होत्रा ग्रुप) द्वारा बीते साल 17 मई 2025 में दर्ज कराए गए संगीन धाराओं के झूठे मुकदमे की तिजारत तक सिलसिला बहुत संजीदा और दर्दनाक है। महिला किसान को तीन बार कूटरचित ढंग से जेल भेजने का काम किया गया लेकिन हर दफा सिस्टम और माफिया ने न्यायालय मे मुंह की खाई है।
जब कभी जिले मे कोई माननीय या ऐसा मंत्री, मुख्यमंत्री आमद करता तो ऊषा निषाद को नजरबंद कर दिया जाता है ताकि प्रतिरोध की ये आवाज उनके कानों की गूंज न बन सके। यूपी की राजधानी लखनऊ विधानसभा से बांदा, महोबा पीएम की जनसभा तक धरना कर चुकी यह महिला किसान आज भी निर्भीकता से डटी है।
मकसद स्पष्ट है गांव और क्षेत्र के किसानों का जल जीवन बचाना। यहीं कारण है एनजीटी में याचिका संख्या 614/2025 दाखिल करके यह धरातल पर बड़े खनन ठेकेदारों से जूझ रहीं है। यह अलग बात है बांदा आसपास इस मुद्दे पर खेतिहर महिलाओं मे इसकी जागरूकता नहीं है। यह लड़ाई पुरुषों के ज्ञापन तक सीमित है।
बिना किसी विवाद के प्रशासन की मदद करके पूरी कराई 34 साल पुरानी चकबंदी
सरकारी व्यवस्था की लापरवाही से गांवों में अधूरी पड़ी चकबंदी के कारण किसानों के बीच आपसी विवाद और खूनी संघर्ष खेतों की जोत, मेडबंदी और चक को लेकर होना आम बात है।
यही हालात गांवों मे न हो इसके लिए उक्त महिला किसान ने भले ही अन्य मामलों मे प्रशासन की मार झेली लेकिन गांव हित और किसानों के भले को तवज्जो देते हुए प्रमुखता से अपने मूल गांव सांडी मे चौतीस साल पुरानी रुकी पड़ी चकबंदी को तहसील अफसरों के साथ मिलकर पूरा कराया।
यह कार्य लोकहित मे पिछले साल की गर्मी में पूरा कराया गया था। जबकि पिछले चार दशक से एक ही परिवार की ग्राम प्रधानी (दिवंगत पतिराखन निषाद, उनकी धर्मपत्नी और अब भतीजा की सरपंची) इस काम मे रत्तीभर सहयोग प्रशासन का नहीं कर सकी।
ग्राम वासियों के लिए सदा ढाल बनकर खड़ी होने वाली महिला किसान पर इलाकाई जनता का पूरा भरोसा है। आज गांव से दिल्ली तक किसानों की नदी और खेती को बचाने का भरसक काम कर रही महिला किसान अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का उदाहरण है।

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