केन-बेतवा लिंक परियोजना पर उबाल: 11 दिन का जनआंदोलन जारी, जंगलों और विस्थापन को लेकर उठे सवाल
केंद्र सरकार और विश्व बैंक के सहयोग से प्रस्तावित इस परियोजना का बजट लगभग 44,605 करोड़ रुपये बताया जा रहा है।
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बांदा से आशीष सागर दीक्षित की रिपोर्ट —
बांदा/जनमत न्यूज । बुंदेलखंड को सिंचाई के नाम पर समृद्ध बनाने का दावा करने वाली केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। पन्ना टाइगर रिजर्व और आसपास के गांवों में रहने वाले आदिवासी और किसान पिछले 11 दिनों से आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन अब तक उनकी मांगों पर ठोस समाधान नहीं निकल सका है।
दरअसल, मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले की बिजावर तहसील और पन्ना टाइगर रिजर्व के करीब 10 गांव इस परियोजना के डूब क्षेत्र में आ रहे हैं, जबकि लगभग 20 अन्य गांवों को आजीविका, आवास और खेती के संकट का सामना करना पड़ सकता है। केंद्र सरकार और विश्व बैंक के सहयोग से प्रस्तावित इस परियोजना का बजट लगभग 44,605 करोड़ रुपये बताया जा रहा है।
सरकार का दावा है कि इस परियोजना से बुंदेलखंड के पन्ना, छतरपुर, महोबा, ललितपुर, झांसी और बांदा जिलों को सिंचाई और पेयजल की सुविधा मिलेगी, जिससे करीब 10 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होगी। साथ ही बिजली उत्पादन के लिए 103 मेगावाट का पावर प्लांट भी प्रस्तावित है।
हालांकि, आंदोलनकारी इस परियोजना को पर्यावरण और आदिवासी अस्तित्व के लिए गंभीर खतरा बता रहे हैं। उनका कहना है कि पन्ना टाइगर रिजर्व की 6 हजार हेक्टेयर से अधिक वनभूमि अधिग्रहित की जा रही है, जिससे लाखों पेड़ों के कटान और जैव विविधता को भारी नुकसान की आशंका है।
सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर के नेतृत्व में हजारों आदिवासी और किसान पिछले 11 दिनों से चिता आंदोलन, जल सत्याग्रह और मिट्टी आंदोलन के जरिए विरोध जता रहे हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि पुनर्वास, मुआवजा और ग्राम सभा की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है।
उनका यह भी कहना है कि वन अधिकार अधिनियम 2006, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 जैसे महत्वपूर्ण कानूनों की अनदेखी की जा रही है।
हालांकि, एसडीएम बिजावर, पन्ना और छतरपुर के कलेक्टरों ने आंदोलन स्थल का दौरा कर संवाद की कोशिश की है, लेकिन अब तक कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है। क्षेत्र में धारा 143 लागू कर दी गई है और बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है।
आंदोलनकारियों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनके राशन-पानी तक की आपूर्ति बाधित कर दी है और चिकित्सा सुविधाएं भी नहीं पहुंच पा रही हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना जहां एक ओर सिंचाई और जल संकट का समाधान प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण, वन्यजीव और आदिवासी जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।
फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी की रिपोर्ट (2017) में भी पावर प्लांट को हटाने की सिफारिश की गई थी, लेकिन इसे अब तक लागू नहीं किया गया है।
अब देखना यह होगा कि प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच चल रहा संवाद जंगलों और लोगों के भविष्य को सुरक्षित रख पाएगा या यह संघर्ष केवल मुआवजे और पुनर्वास तक सीमित रह जाएगा।
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