अमेरिका-सऊदी अरब के बीच न्यूक्लियर डील को मिली मंजूरी, शुरू हो जाएगी परमाणु हथियारों की रेस!
ईरान संग जारी जंग के बीच अमेरिका और सऊदी के बीच परमाणु डील हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को सऊदी अरब के साथ ऐतिहासिक परमाणु समझौते को मंजूरी दे दी है।
वाशिंगटन/जनमत न्यूज़। ईरान संग जारी जंग के बीच अमेरिका और सऊदी के बीच परमाणु डील हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को सऊदी अरब के साथ ऐतिहासिक परमाणु समझौते को मंजूरी दे दी है। यह समझौता अगले 30 सालों के लिए लागू होगा और इसकी कीमत अरबों डॉलर मानी जा रही है।
समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में परमाणु संयंत्र बनाने में मदद करेंगी। अब इस फैसले ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है इसकी वजह यह है कि अमेरिका ने इस डील में परमाणु हथियार बनाने से रोकने वाले सुरक्षा नियम जोड़े ही नहीं हैं।
गौरतलब है कि आमतौर पर जब अमेरिका किसी देश को परमाणु तकनीक देता है, तो उस पर सख्त पाबंदियां लगाता है। लेकिन सऊदी अरब के साथ इस डील में कई बड़ी ढील दी गई हैं। डील के तहत सऊदी अरब अब अपनी ही जमीन पर यूरेनियम को रिफाइन कर सकेगा।
अमेरिका के पुराने नियमों के मुताबिक किसी भी देश को यूरेनियम संवर्धन या परमाणु कचरे को रीप्रोसेस करने की इजाजत नहीं थी। हालांकि सऊदी वाली डील मर इस शर्त को हटा दिया गया है।
इसके अलावा डील में एक और गच्चा है। अन्य परमाणु समझौते से अलग, इस समझौते के तहत संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी, IAEA को बिना बताए अचानक चेकिंग करने की इजाजत नहीं होगी।
बताया गया है कि यूरेनियम एनरिचमेंट से जुड़े सभी सुरक्षा नियम केवल अमेरिका और सऊदी आपस में मिलकर तय करेंगे। इस छूट को लेकर कई विशेषज्ञ सवाल खड़े कर रहे हैं।
क्यों है खतरे की घंटी?
गौरतलब है कि यूरेनियम को ही एनरिच या रिफाइन कर परमाणु बम बनाया जा सकता है। कड़े सुरक्षा नियम न होने के कारण विशेषज्ञों को डर है कि भविष्य में सऊदी अरब इस तकनीक का इस्तेमाल हथियार बनाने में कर सकता है। आशंका यह भी है कि डील का असली मकसद ही यही है।
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पूर्व में खुलेआम कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु बम बनाता है, तो सऊदी भी बिना किसी देरी के अपना परमाणु हथियार विकसित करेगा। ऐसे में समझौते की मंशा पर सवाल उठने लाजमी हैं।
शुरू हो जाएगी परमाणु हथियारों की होड़
इस समझौते के बाद अब पश्चिम एशिया में परमाणु हथियार बनाने की नई रेस शुरू हो सकती है। अगर सऊदी अरब अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन शुरू करता है, तो ईरान भी परमाणु गतिविधियों को और तेज कर सकता है।
साथ ही कई दूसरे अरब देश भी इस तरह के कदम उठा सकते हैं। वहीं दुनिया के दूसरे देश भी अब अमेरिका से बिना कड़े नियमों के परमाणु तकनीक मांग सकते हैं।


