स्तंभकार और लेखक मुनीश त्रिपाठी की पुस्तक ‘महापराक्रमी महाराजा सूरजमल’ प्रकाशित, बुद्धिजीवियों ने दी शुभकामनाएं
वरिष्ठ स्तंभकार, पत्रकार एवं प्रतिष्ठित उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘के. एम. मुंशी पुरस्कार’ से सम्मानित लेखक मुनीश त्रिपाठी की बहुप्रतीक्षित नई पुस्तक ‘महापराक्रमी महाराजा सूरजमल’ प्रकाशित हो गई है।
औरैया से अरुण वाजपेयी की रिपोर्ट
औरैया/जनमत न्यूज़। वरिष्ठ स्तंभकार, पत्रकार एवं प्रतिष्ठित उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के ‘के. एम. मुंशी पुरस्कार’ से सम्मानित लेखक मुनीश त्रिपाठी की बहुप्रतीक्षित नई पुस्तक ‘महापराक्रमी महाराजा सूरजमल’ प्रकाशित हो गई है। पुस्तक का प्रकाशन नई दिल्ली के प्रख्यात सुरुचि प्रकाशन द्वारा किया गया है।
यह पुस्तक महाराजा सूरजमल के जीवन, शौर्य, नेतृत्व क्षमता और ऐतिहासिक पराक्रम पर आधारित है, जिसे लेखक ने गहन शोध एवं प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर तैयार किया है। पुस्तक में वर्णित है कि मुगलों द्वारा हिंदुओं पर किए जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध महाराजा सूरजमल ने निर्णायक संघर्ष कर उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित की थीं।
लेखक के अनुसार, महाराजा सूरजमल ने एक समय कानपुर के सिकंदरा सूबे से लेकर आगरा, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली के समीपवर्ती क्षेत्रों तक अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था, जिसके परिणामस्वरूप मुगल सत्ता दिल्ली नगर तक सीमित होकर रह गई थी। वर्ष 1762 में उन्होंने मुगलों की दूसरी राजधानी आगरा तथा उसके ऐतिहासिक किले पर भी विजय प्राप्त की थी।
पुस्तक में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि मराठा सरदार सदाशिवराव भाऊ ने महाराजा सूरजमल की रणनीतिक सलाह स्वीकार कर ली होती, तो पानीपत का युद्ध मराठों के पक्ष में जा सकता था और भारतीय इतिहास की दिशा भिन्न हो सकती थी। लेखक ने यह भी रेखांकित किया है कि महाराजा सूरजमल ने उस समय आगरा पर विजय प्राप्त की, जब अहमद शाह अब्दाली स्वयं दिल्ली में मौजूद था।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2021 में मुनीश त्रिपाठी की महाराजा सूरजमल पर आधारित उपन्यास शैली की पुस्तक ‘भरतपुर का सूरजमल’ भी अत्यंत चर्चित रही थी। इस पुस्तक को अमेजन और फ्लिपकार्ट पर लंबे समय तक पाँच सितारा रेटिंग प्राप्त हुई थी। इसी कृति के लिए लेखक को इटावा साहित्य हिंदी निधि तथा औरैया प्रशासन द्वारा ‘औरैया रत्न’ सम्मान से भी अलंकृत किया जा चुका है।
‘महापराक्रमी महाराजा सूरजमल’ मुनीश त्रिपाठी की पाँचवीं पुस्तक है। इससे पूर्व उनकी ‘विभाजन की त्रासदी’, ‘भरतपुर का सूरजमल’, ‘The Line Which Divided Bharat’ तथा ‘आंबेडकर, हिंदुत्व और भारत’ जैसी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें पाठकों और बुद्धिजीवियों का व्यापक सराहना मिली है।
पुस्तक के प्रकाशन पर क्षेत्र के अनेक गणमान्य नागरिकों, साहित्यकारों, पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों ने मुनीश त्रिपाठी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ देते हुए उनके उज्ज्वल साहित्यिक भविष्य की कामना की है।


