उरई में बारिश से फसलें बर्बाद, बीमा कंपनी के सर्वे पर उठे सवाल; किसानों में नाराजगी

उप्र के उरई जनपद में बारिश से फसलों को हुए नुकसान के बाद किसान अब फसल बीमा के सर्वे और मुआवजे को लेकर परेशान हैं।

उरई में बारिश से फसलें बर्बाद, बीमा कंपनी के सर्वे पर उठे सवाल; किसानों में नाराजगी
Published By- Diwaker Mishra

उरई से सुनील शर्मा की रिपोर्ट

उरई/जनमत न्यूज़। उप्र के उरई जनपद में बारिश से फसलों को हुए नुकसान के बाद किसान अब फसल बीमा के सर्वे और मुआवजे को लेकर परेशान हैं। किसानों का कहना है कि खेतों में तिलहन और दलहन की फसलें बड़े पैमाने पर बर्बाद हो गई हैं, लेकिन नुकसान के आकलन की प्रक्रिया उन्हें राहत देने वाली नहीं दिख रही है।

उनका आरोप है कि गंभीर क्षति के बावजूद जिले को मिड सीजन सर्वे में शामिल नहीं किया गया। इससे फसल बीमा योजना के तहत नुकसान की भरपाई को लेकर उनकी चिंता बढ़ गई है।

किसानों की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, जिले में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के माध्यम से फसल बीमा के 1,76,871 आवेदन किए गए हैं। इसके अलावा किसानों ने स्वयं 13,182 आवेदन किए हैं। इस तरह कुल आवेदनों की संख्या 1,90,053 है।

इन आवेदनों के तहत कुल बीमित क्षेत्र 72,950 हेक्टेयर बताया गया है। हालांकि, आवेदन संख्या को अलग-अलग लाभार्थी किसानों की संख्या मानने से पहले संबंधित अभिलेखों से पुष्टि जरूरी है।

उपलब्ध विवरण में सरकार की ओर से बीमा कंपनी के लिए करीब 21.81 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत होने की बात कही गई है। हालांकि, यह राशि प्रीमियम सहायता, दावा भुगतान से संबंधित है जिस पर बीमा कंपनी लीपापोती करती नजर आ रही है।

किसानों का आरोप है कि जिले में 75 फीसद से अधिक फसलों को नुकसान पहुंचने के बावजूद बीमा कंपनी ने मिड सीजन सर्वे की जरूरत नहीं समझी। उनका दावा है कि बुंदेलखंड के अन्य जिलों को इस सर्वे में शामिल किया गया है, जबकि जालौन को बाहर रखा गया।

किसानों का आरोप है कि वर्ष 2025 में रबी की फसल को ओलावृष्टि से हुए नुकसान का प्रशासन ने सर्वे कराया था। उनके मुताबिक, प्रशासनिक आकलन में क्षति 40 से 70 फीसद तक बताई गई थी, लेकिन बीमा कंपनी ने इसे महज दो से पांच फीसद माना। दोनों आकलनों के बीच कथित अंतर के कारणों पर कंपनी का स्पष्टीकरण नहीं मिल पाया है।

किसानों का कहना है कि फसल बर्बाद होने के बाद बीमा से राहत की उम्मीद थी, लेकिन सर्वे को लेकर अनिश्चितता ने उनकी परेशानी बढ़ा दी है। इस मामले में वे जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर भी सवाल उठा रहे हैं।

उनके आरोपों के बीच मुख्य प्रश्न यही है कि वास्तविक नुकसान का आकलन किस आधार पर होगा और प्रभावित किसानों को राहत कैसे मिलेगी।

इस संबंध में एसबीआई इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के जिला प्रबंधक बताए गए पवन कुमार से पक्ष जानने के लिए उपलब्ध मोबाइल नंबर पर कई बार संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी।

कंपनी का पक्ष नहीं मिलने से सर्वे, नुकसान के आकलन और जिले को शामिल नहीं किए जाने संबंधी आरोपों पर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है।