उरई में 15 जून से 3 अगस्त तक पचास फीसद भी नहीं हुई बारिश, नष्ट होने की कगार पर खरीफ की फसल
उप्र के उरई जनपद में इस वर्ष बारिश बहुत कम दर्ज हो रही है हालांकि मौसम विभाग में यह पूर्व में ही इशारा कर दिया था।
उरई से सुनील शर्मा की रिपोर्ट
उरई/जनमत न्यूज़। उप्र के उरई जनपद में इस वर्ष बारिश बहुत कम दर्ज हो रही है हालांकि मौसम विभाग में यह पूर्व में ही इशारा कर दिया था। जनपद में 15 जून से 3 अगस्त 2026 तक वारिश का जो आंकड़ा है वह 159.5 मिमी है जबकि 2025 में 3 अगस्त तक 368.5 मिमी दर्ज की गई थी।
जिले में लगभग दो लाख हेक्टेयर में खरीफ की फसल की बुआई की गई है जिसमें सबसे अधिक क्षेत्रफल में धान की फसल है इसके बाद मूंग,तिल और उड़द भी है कुछ स्थानों पर मक्का भी होता है।
बारिश की कमी के चलते इन फसलों पर संकट के बादल मंडराने लगे है धान की फसल बच सकती है क्योंकि जिस किसान के पास पानी का बंदोबस्त होता है वही इस फसल को करता है अधिकांश ट्यूबेल वाले की धान की फसल को करते है बाकी जितनी फसल है उसमें 70 से 80 फीसदी नुकसान हो चुका है।
मौसम विभाग की मानें तो बुंदेलखंड भयंकर सुखे की चपेट में है क्योंकि आने वाले महीने अगस्त और सितंबर में औसत बारिश से कम दिखा रहे है वैसे जिले में औसत बारिश 862 मिमी है, लेकिन जिले में 2025 में भी 638.5 मिमी बारिश अंकित की गई थी जो औसत बारिश से कम है।
बुंदेलखंड में सामान्यतः 350 मिमी वर्षा होनी चाहिए थी, लेकिन अब तक केवल 150 मिमी वर्षा ही दर्ज की गई है। यानी इस मानसून सीजन में अब तक लगभग 57% वर्षा की कमी बनी हुई है। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि खेती, पेयजल, तालाबों, नदियों, भूजल और लाखों ग्रामीण परिवारों की आजीविका से जुड़ी एक गंभीर चेतावनी है।
बुंदेलखंड के अनेक क्षेत्रों में खरीफ की फसल सूखने लगी हैं। किसान आसमान की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है, लेकिन लगातार कमजोर पड़ते मानसून ने उसकी चिंता बढ़ा दी है। खेतों में बोई गई फसलों का भविष्य अब आने वाली बारिश पर निर्भर है।
चिंता की बात यह भी है कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने संकेत दिए हैं कि अगस्त में मानसून सामान्य से कमजोर रह सकता है और सितंबर में भी इसके कमजोर रहने की संभावना है। यदि ऐसा होता है, तो अब तक की वर्षा कमी की भरपाई होना बेहद कठिन होगी।
इसका असर केवल इस वर्ष की खेती तक सीमित नहीं रहेगा। जलाशयों, तालाबों, कुओं और भूजल स्तर पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा, जिससे आने वाले महीनों में पेयजल और सिंचाई दोनों की स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।


