उरई में बंदरों के आतंक का होगा अंत, उनके ठिकाने के लिए 50 कपि वन वाटिकाएं होंगी विकसित

नगरीय क्षेत्रों में बंदरों के बढ़ते आवागमन और मानव-वानर संघर्ष की समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में उरई जिला प्रशासन ने प्रकृति आधारित पहल को आगे बढ़ाया है।

उरई में बंदरों के आतंक का होगा अंत, उनके ठिकाने के लिए 50 कपि वन वाटिकाएं होंगी विकसित
Published By- Diwaker Mishra

उरई से सुनील शर्मा की रिपोर्ट

उरई/जनमत न्यूज़। नगरीय क्षेत्रों में बंदरों के बढ़ते आवागमन और मानव-वानर संघर्ष की समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में उरई जिला प्रशासन ने प्रकृति आधारित पहल को आगे बढ़ाया है।

बंदरों को शहरों और आबादी वाले क्षेत्रों से दूर उनके प्राकृतिक परिवेश में ही पर्याप्त भोजन एवं सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से पूरे जनपद में लगभग 50 कपि वन वाटिकाएं विकसित की जाएंगी।

जिलाधिकारी राजेश कुमार पाण्डेय ने विकास भवन स्थित रानी लक्ष्मीबाई सभागार में कपि वन वाटिकाओं में कराए जा रहे पौधरोपण, पूर्व में लगाए गए पौधों की स्थिति एवं उनके संरक्षण की समीक्षा करते हुए संबंधित अधिकारियों को प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश दिए।

जिलाधिकारी ने कहा कि कपि वन वाटिकाओं का उद्देश्य केवल पौधरोपण करना नहीं, बल्कि बंदरों के लिए ऐसा प्राकृतिक आवास तैयार करना है, जहां उन्हें पर्याप्त भोजन और सुरक्षित आश्रय मिल सके तथा भोजन की तलाश में उन्हें आबादी वाले क्षेत्रों की ओर न आना पड़े।

इससे जहां मानव-वानर संघर्ष की घटनाओं में कमी आएगी, वहीं नगरीय क्षेत्रों के आसपास हरित क्षेत्र का विस्तार भी होगा। उन्होंने निर्देश दिए कि नगरीय क्षेत्रों के समीप न्यूनतम एक हेक्टेयर भूमि में विकसित किए जा रहे कपि वन में बंदरों के लिए उपयोगी एवं फलदार प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए।

आम, जामुन, अमरूद, कटहल, बड़हल, बेल, गूलर और बेर जैसे फलदार वृक्षों का रोपण कर प्राकृतिक भोजन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, ताकि समय के साथ ये वाटिकाएं बंदरों के लिए प्राकृतिक भोजन और आश्रय का स्थायी केंद्र बन सकें। जिलाधिकारी ने पूर्व में लगाए गए पौधों की सर्वाइवल रेट को गंभीरता से लेते हुए प्रत्येक पौधे के संरक्षण की जिम्मेदारी तय करने के निर्देश दिए।

उन्होंने कहा कि जो पौधे जीवित हैं, उनके बेहतर विकास के लिए नियमित सिंचाई एवं देखभाल सुनिश्चित की जाए तथा मृत अथवा क्षतिग्रस्त पौधों के स्थान पर तत्काल नए पौधे लगाए जाएं। साथ ही कपि वन की सुरक्षा के लिए आवश्यक बाड़बंदी एवं अन्य संरक्षण उपाय प्रभावी रूप से किए जाएं।

उन्होंने कहा कि पौधरोपण की सफलता केवल पौधे लगाने में नहीं, बल्कि उन्हें वृक्ष बनने तक सुरक्षित रखने में है। इसलिए कपि वन वाटिकाओं में लगाए गए पौधों की नियमित निगरानी की जाए और उनकी स्थिति का निरंतर अनुश्रवण किया जाए।

प्रत्येक वाटिका को केवल एक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी और पर्यावरण संरक्षण के केंद्र के रूप में विकसित किया जाए। जिला प्रशासन द्वारा विकसित की जा रही इन वाटिकाओं के संरक्षण में जनभागीदारी को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

मेरी वाटिका, मेरी जिम्मेदारीकी भावना के साथ लोगों को इन हरित स्थलों के संरक्षण और पौधों की देखभाल से जोड़ा जाएगा, ताकि लगाए गए पौधे सुरक्षित रहकर भविष्य में घने वृक्षों का रूप ले सकें। लगभग 50 कपि वन वाटिकाओं के विकास की यह पहल जालौन में पर्यावरण संरक्षण, हरित क्षेत्र के विस्तार और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

प्राकृतिक भोजन और आश्रय मिलने से बंदरों का आबादी वाले क्षेत्रों की ओर अनावश्यक आवागमन कम होगा और मानव-वानर संघर्ष को नियंत्रित करने के साथ-साथ प्रकृति और वन्यजीवों के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में ठोस प्रयास को गति मिलेगी।

इस अवसर पर मुख्य विकास अधिकारी केके सिंह, पूर्व विधायक नरेंद्र सिंह जादौन, जिला पंचायत राज अधिकारी राम अयोध्या प्रसाद आदि सहित सम्बंधित अधिकारी व जनप्रतिधि मौजूद रहे।